Sunday, June 13, 2010

मन को जानें..

मन की अलग सी चेतना की उत्पत्ति के बाद से ही मनुष्य इस पर लगातार अपना दिमाग़ खपाता आ रहा है। यह क्या है? इससे व्यवहार कैसे निर्देशित होता है? क्या मन का शरीर से अलग अस्तित्व है? यह हमें नियंत्रित करता है या हम इसे नियंत्रित कर सकते हैं? ऐसे अनेको प्रश्नों से जूझने और यथासंभव उत्तर तलाशने के प्रयत्नों से मानवजाति का इतिहास भरा हुआ है। *साधो, मन माने की बात*, *साधो देखो जग बौराना* से लेकर *मन ना रंगाए रंगाए जोगी कपडा* तक ऐसे ही अनेकों मुहावरों और लोकोक्तियां भी भारतीय समाज में प्रचलन में हैं, जो सामान्य रूप से भी मन की लोक-महत्ता को रेखांकित करते हैं। वहीं मन को साधने और नियंत्रित करने के तमाम भाष्य हमारे शास्त्रों में दर्ज़ हैं। *...मनसो ही मनो रिपु: *, मन ही मन का शत्रु है, भी कहा गया है।जहां भारत में वैदिक संहिताएं और बाद में उपनिषदें, योग मन की सीधे और कभी आत्मा के रूप में इसको परिभाषित करने का, समझने का प्रयत्न कर रहे थे, वहीं बाहर हीरेक्लाइटस, डेमोक्राइटस, प्लेटो और अरस्तु की शिक्षाएं, मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के आगामी विकास की नींव रख रही थी। आज समकालीन मनोविज्ञान जुंग, व्रील, जोन्स, फ्रेकेन्जी्, एडलर और अन्य द्वंदवादी धाराओं के चिंतकों के बीच मन को समझने और मनुष्य के व्यवहार की समस्याओं को नियंत्रित करने में उल्लेखनीय भूमिका निभा रहा है।यह सब हमें सिखाता है कि मन के नियंत्रण के लिए, मन को और इसके सापेक्ष मनुष्य और उसकी सक्रियता को समझा जाना ज़्यादा जरूरी है। यह जानना-समझना ही इसको नियंत्रित करने की पहली सीढ़ी है।यही इस ब्लॉग के जरिए हमारा उद्देश्य भी है, मन को जानना-समझना और उसे विश्लेषित करना। यह निश्चित ही हमारी मनसिकताओं, विचारों और व्यवहार को परिष्कृत करने में सहायक होगा।